भारतीय संस्कृति में गाय को माता कहा गया, लेकिन आज वही गाय सड़कों पर भटकती, भूखी, घायल और उपेक्षित दिखाई देती है। यह केवल गाय की दुर्दशा नहीं है, बल्कि हमारे समाज, मूल्यों और जिम्मेदारी की दुर्दशा भी है। जिस गाय ने सदियों तक मानव जीवन को पोषण, शक्ति और संतुलन दिया, आज वही मानव की लापरवाही का शिकार बन रही है।
आज गाय इस स्थिति में क्यों पहुँची?
आधुनिक जीवनशैली, उपभोक्तावाद और सुविधा प्रधान सोच ने गाय को उपयोग की वस्तु बनाकर छोड़ दिया है। जब तक गाय दूध देती है, तब तक वह स्वीकार्य है; जैसे ही वह बूढ़ी या अनुपयोगी मानी जाती है, उसे बेसहारा छोड़ दिया जाता है।
- शहरीकरण और मशीनों ने गौपालन को हाशिये पर डाल दिया
- किसानों के लिए गाय पालना घाटे का सौदा बन गया
- पारंपरिक गौ-आधारित अर्थव्यवस्था टूट गई
- समाज ने जिम्मेदारी से मुँह मोड़ लिया
सड़कों पर भटकती गायें: एक मौन पीड़ा
आज शहरों और गाँवों की सड़कों पर गायें:
- प्लास्टिक खाती हैं
- दुर्घटनाओं का शिकार होती हैं
- भूख और प्यास से तड़पती हैं
- बिना इलाज के मर जाती हैं
यह दृश्य केवल दुःखद नहीं, बल्कि मानवता पर एक प्रश्नचिह्न है।
गौशालाओं की दुर्दशा
जो गौशालाएँ गायों को बचाने का प्रयास कर रही हैं, वे स्वयं संकट में हैं।
अधिकतर गौशालाएँ:
- अनियमित दान पर निर्भर हैं
- संसाधनों की कमी से जूझ रही हैं
- चारे, दवा और देखभाल के लिए संघर्ष कर रही हैं
- आधुनिक और डिजिटल सहायता से वंचित हैं
सेवा की भावना प्रबल है, लेकिन व्यवस्था कमजोर है।
आध्यात्मिक दृष्टि से चेतावनी
शास्त्रों में कहा गया है कि जिस समाज में करुणा समाप्त हो जाती है, वहाँ अशांति बढ़ जाती है।
गाय की उपेक्षा केवल सामाजिक अपराध नहीं, बल्कि आध्यात्मिक पतन का संकेत भी मानी गई है।
जब:
- सेवा की जगह स्वार्थ ले ले
- दया की जगह सुविधा आ जाए
- और कर्तव्य की जगह उपेक्षा
तो समाज असंतुलित हो जाता है।
यह समस्या केवल गाय की नहीं है
गाय की दुर्दशा के साथ-साथ:
- पर्यावरण बिगड़ रहा है
- ग्रामीण रोजगार खत्म हो रहा है
- जैविक खेती नष्ट हो रही है
- स्वास्थ्य समस्याएँ बढ़ रही हैं
अर्थात् गाय की उपेक्षा का असर पूरे समाज और भविष्य की पीढ़ियों पर पड़ रहा है।
समाधान: जिम्मेदारी और सहभागिता
गाय की दुर्दशा का समाधान केवल कानून या सरकार से नहीं होगा।
इसका समाधान है:
- समाज की सहभागिता
- संगठित और पारदर्शी व्यवस्था
- प्रत्येक परिवार की जिम्मेदारी
“एक परिवार · एक गाय” जैसे विचार इसी चेतना को जाग्रत करते हैं।
Gaudaan: दुर्दशा से समाधान की ओर
आज के समय में हर व्यक्ति सीधे गाय पाल नहीं सकता, लेकिन Gaudaan जैसे मंच समाज को यह अवसर देते हैं कि वे गौशालाओं के माध्यम से गायों की रक्षा कर सकें।
यह मंच:
- गाय की दुर्दशा को सेवा में बदलता है
- बिखरी करुणा को संगठित करता है
- और समाज को जिम्मेदारी की ओर ले जाता है
निष्कर्ष
गाय की दुर्दशा केवल एक दृश्य नहीं,
यह हमारे समय की सबसे बड़ी नैतिक चुनौती है।
👉 यदि आज गाय नहीं बची,
तो कल मानवता भी नहीं बचेगी।
अब समय आ गया है कि हम
देखने वाले नहीं,
जिम्मेदारी लेने वाले बनें।

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